क्या पता क्या सोच कर डरने लगा
By syed-masood-naqviJanuary 5, 2024
क्या पता क्या सोच कर डरने लगा
वो अचानक हाओ-हू करने लगा
इस लिए मैं हो गया तुम से अलग
खोखले रिश्तों से जी भरने लगा
वो क़यामत की घड़ी थी वस्ल में
हुस्न जब घायल मुझे करने लगा
अब दरिंदों को मुबारकबाद दो
आदमी से आदमी डरने लगा
वक़्त कर देगा उसे भी राएगाँ
वक़्त को जो राएगाँ करने लगा
एक चेहरा देखता हूँ ख़्वाब में
एक ख़्वाहिश पर ये दिल मरने लगा
वो अचानक हाओ-हू करने लगा
इस लिए मैं हो गया तुम से अलग
खोखले रिश्तों से जी भरने लगा
वो क़यामत की घड़ी थी वस्ल में
हुस्न जब घायल मुझे करने लगा
अब दरिंदों को मुबारकबाद दो
आदमी से आदमी डरने लगा
वक़्त कर देगा उसे भी राएगाँ
वक़्त को जो राएगाँ करने लगा
एक चेहरा देखता हूँ ख़्वाब में
एक ख़्वाहिश पर ये दिल मरने लगा
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