क्यूँ-कर कहूँ आहों में मिरी बे-असरी है
By ishrat-jahangirpuriJanuary 3, 2024
क्यूँ-कर कहूँ आहों में मिरी बे-असरी है
जब देख रहा हूँ कि इन आँखों में तरी है
पैग़ाम-ए-बहाराँ न दो ऐ अहल-ए-गुलिस्ताँ
दीवानों की क़िस्मत ही में जब दर-ब-दरी है
वो अहल-ए-ख़िरद हैं जो बदलते हैं बहर-गाम
अब भी वही दीवाने वही जामा-दरी है
लाज़िम है कि मग़रूर न हो ‘ऐश-ए-बक़ा पर
ऐ दोस्त ज़माने में हर इंसाँ सक़री है
अग़्यार तो वाक़िफ़ हैं मिरे हाल से लेकिन
अफ़सोस मिरे ग़म से उन्हें बे-ख़बरी है
उठते ही नज़र होश की महफ़िल हुई बरहम
ऐ दोस्त क़यामत है कि ये ‘इश्वा-गरी है
मैं क्यों रहूँ महरूम गुल-ए-दाग़-ए-जिगर से
जब उन की जफ़ाओं की हर इक शाख़ हरी है
ख़ुद ही कभी नालाँ कभी बरहम कभी बद-ज़न
ये मश्ग़ला-ए-'इश्क़ 'अजब दर्द-ए-सरी है
दुनिया की बहारों पे 'अबस नाज़ है ऐ दिल
हर चीज़ यहाँ मिस्ल-ए-चराग़-ए-सहरी है
'इशरत' करे तारीख़ न क्यों नाज़ हमीं पर
हम जैसा ज़माने में कहाँ कोई जरी है
जब देख रहा हूँ कि इन आँखों में तरी है
पैग़ाम-ए-बहाराँ न दो ऐ अहल-ए-गुलिस्ताँ
दीवानों की क़िस्मत ही में जब दर-ब-दरी है
वो अहल-ए-ख़िरद हैं जो बदलते हैं बहर-गाम
अब भी वही दीवाने वही जामा-दरी है
लाज़िम है कि मग़रूर न हो ‘ऐश-ए-बक़ा पर
ऐ दोस्त ज़माने में हर इंसाँ सक़री है
अग़्यार तो वाक़िफ़ हैं मिरे हाल से लेकिन
अफ़सोस मिरे ग़म से उन्हें बे-ख़बरी है
उठते ही नज़र होश की महफ़िल हुई बरहम
ऐ दोस्त क़यामत है कि ये ‘इश्वा-गरी है
मैं क्यों रहूँ महरूम गुल-ए-दाग़-ए-जिगर से
जब उन की जफ़ाओं की हर इक शाख़ हरी है
ख़ुद ही कभी नालाँ कभी बरहम कभी बद-ज़न
ये मश्ग़ला-ए-'इश्क़ 'अजब दर्द-ए-सरी है
दुनिया की बहारों पे 'अबस नाज़ है ऐ दिल
हर चीज़ यहाँ मिस्ल-ए-चराग़-ए-सहरी है
'इशरत' करे तारीख़ न क्यों नाज़ हमीं पर
हम जैसा ज़माने में कहाँ कोई जरी है
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