लबों पे अपने हँसी सजा कर मैं जी रहा हूँ तुम्हारी ख़ातिर
By shad-nimbahediJanuary 5, 2024
लबों पे अपने हँसी सजा कर मैं जी रहा हूँ तुम्हारी ख़ातिर
तमाम सदमों को यूँ छुपा कर मैं जी रहा हूँ तुम्हारी ख़ातिर
वो वक़्त-ए-रुख़्सत तुम्हारा हँसना नमी थी आँखों में ख़ूब लेकिन
सभी जुदाई के ग़म भुला कर मैं जी रहा हूँ तुम्हारी ख़ातिर
ख़मोश धड़कन खुली हैं आँखें ग़म-ए-जुदाई सियाह रातें
चराग़-ए-उल्फ़त जला जला कर मैं जी रहा हूँ तुम्हारी ख़ातिर
जिन्हें लबों से था मैं ने चूमा जिन्हें मोहब्बत था मैं ने माना
उन्हीं ख़तों को कहीं बहा कर मैं जी रहा हूँ तुम्हारी ख़ातिर
जहाँ में आए पता नहीं क्यों कोई बताए ये 'शाद' मुझ को
जनाज़ा ख़ुद का ख़ुदी उठा कर मैं जी रहा हूँ तुम्हारी ख़ातिर
तमाम सदमों को यूँ छुपा कर मैं जी रहा हूँ तुम्हारी ख़ातिर
वो वक़्त-ए-रुख़्सत तुम्हारा हँसना नमी थी आँखों में ख़ूब लेकिन
सभी जुदाई के ग़म भुला कर मैं जी रहा हूँ तुम्हारी ख़ातिर
ख़मोश धड़कन खुली हैं आँखें ग़म-ए-जुदाई सियाह रातें
चराग़-ए-उल्फ़त जला जला कर मैं जी रहा हूँ तुम्हारी ख़ातिर
जिन्हें लबों से था मैं ने चूमा जिन्हें मोहब्बत था मैं ने माना
उन्हीं ख़तों को कहीं बहा कर मैं जी रहा हूँ तुम्हारी ख़ातिर
जहाँ में आए पता नहीं क्यों कोई बताए ये 'शाद' मुझ को
जनाज़ा ख़ुद का ख़ुदी उठा कर मैं जी रहा हूँ तुम्हारी ख़ातिर
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