ले आई इस मक़ाम पे अब गुमरही मुझे
By ustad-azmat-hussain-khanJanuary 5, 2024
ले आई इस मक़ाम पे अब गुमरही मुझे
मंज़िल ने बढ़ के आप ही आवाज़ दी मुझे
ये बात 'उम्र-भर का सुकूँ दे गई मुझे
भूले से उस ने याद किया था कभी मुझे
यारब तिरे करम की कोई इंतिहा नहीं
दामन को अपने देख के शर्म आ गई मुझे
मंज़िल पे पूछते हैं निशाँ मुझ से अहल-ए-होश
ले आई है कहाँ ये मिरी गुमरही मुझे
जब तक रही ख़ुशी तो 'अजब इज़्तिराब था
जब ग़म मिला तो आप ही नींद आ गई मुझे
'मैकश' उस इक नज़र पे मय-ओ-मै-कदा निसार
जिस ने तमाम-‘उम्र को दी सरख़ुशी मुझे
मंज़िल ने बढ़ के आप ही आवाज़ दी मुझे
ये बात 'उम्र-भर का सुकूँ दे गई मुझे
भूले से उस ने याद किया था कभी मुझे
यारब तिरे करम की कोई इंतिहा नहीं
दामन को अपने देख के शर्म आ गई मुझे
मंज़िल पे पूछते हैं निशाँ मुझ से अहल-ए-होश
ले आई है कहाँ ये मिरी गुमरही मुझे
जब तक रही ख़ुशी तो 'अजब इज़्तिराब था
जब ग़म मिला तो आप ही नींद आ गई मुझे
'मैकश' उस इक नज़र पे मय-ओ-मै-कदा निसार
जिस ने तमाम-‘उम्र को दी सरख़ुशी मुझे
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