लोग वाक़िफ़ न रहे लज़्ज़त-ए-रुस्वाई से

By shehzad-anjum-burhaniJanuary 5, 2024
लोग वाक़िफ़ न रहे लज़्ज़त-ए-रुस्वाई से
कोई टकराता नहीं अब तिरे सौदाई से
कुंज-ए-तन्हाई से बाहर नहीं निकले हम भी
वो भी फ़ारिग़ न हुआ अंजुमन-आराई से


ख़ुद को बीमार-ए-मोहब्बत से गुरेज़ाँ न समझ
हम भी 'आजिज़ हैं तिरे दस्त-ए-मसीहाई से
सूरमाओं ने ये तहज़ीब न छोड़ी अब तक
सहमे रहते हैं अभी भी वो बड़े भाई से


'अंजुम' आ'साब सँभालो है यही रंग-ए-बहार
बू-ए-शौक़ आने लगी यार की अंगड़ाई से
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