मैं कहाँ ढूँडने जाता हूँ कुतुब-ख़ानों में
By hasrat-khan-khatakJanuary 3, 2024
मैं कहाँ ढूँडने जाता हूँ कुतुब-ख़ानों में
मुझ को ख़ुद आ के बुलाएँ मिरे अल्फ़ाज़ कि आ
मैं अभी सोच के सहरा में खड़ा होता हूँ
आ ही जाती है किसी सम्त से आवाज़ कि आ
पैर चलने के लिए जूँही क़दम भरते हैं
बजने लग जाते हैं ख़ुद से कई सुर साज़ कि आ
मैं कि हर हद से गुज़रने को हूँ तैयार मगर
कौन कहता है मुझे कोई ब-सद-नाज़ कि आ
हाए वो लम्हा कि जब बाप बुलाए बेटा
आ इधर आ मिरे बेटे मिरे जाँ-बाज़ कि आ
ये अलग बात कि उस्ताद नहीं है 'हसरत'
शे'र-गोई में बुलाएँ सभी उस्ताज़ कि आ
मुझ को ख़ुद आ के बुलाएँ मिरे अल्फ़ाज़ कि आ
मैं अभी सोच के सहरा में खड़ा होता हूँ
आ ही जाती है किसी सम्त से आवाज़ कि आ
पैर चलने के लिए जूँही क़दम भरते हैं
बजने लग जाते हैं ख़ुद से कई सुर साज़ कि आ
मैं कि हर हद से गुज़रने को हूँ तैयार मगर
कौन कहता है मुझे कोई ब-सद-नाज़ कि आ
हाए वो लम्हा कि जब बाप बुलाए बेटा
आ इधर आ मिरे बेटे मिरे जाँ-बाज़ कि आ
ये अलग बात कि उस्ताद नहीं है 'हसरत'
शे'र-गोई में बुलाएँ सभी उस्ताज़ कि आ
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