मसाम-ए-संग से उस दम पसीने ख़ूँ के चलते हैं

By badiuzzaman-saharJanuary 19, 2024
मसाम-ए-संग से उस दम पसीने ख़ूँ के चलते हैं
कफ़न-बर्दोश जब हम कू-ए-क़ातिल में निकलते हैं
कहाँ अहल-ए-जुनूँ छाँव में ज़ुल्फ़ों की टहलते हैं
मशक़्क़त की कड़ी जब धूप होती है तो चलते हैं


तुम्हारी अंजुमन में सिर्फ़ फ़रज़ाने बहलते हैं
जुनूँ के हौसले तो जा के मक़्तल में निकलते हैं
नसीम-ए-नौ-बहारी आ तुझे गुलशन में पहुँचा दें
ये सहरा है यहाँ तो सिर्फ़ दीवाने टहलते हैं


हमा-दम ना-ख़ुदाओ बादबानों पे नज़र रखना
न जाने कब ये आब-ए-तह-नशीं तेवर बदलते हैं
वो है कम-ज़र्फ़ जो दो घूँट पी कर डगमगा जाए
हम ‘आली-ज़र्फ़ जितना पीते हैं उतना सँभलते हैं


हमारा दामन-ए-तर शैख़ के जुब्बे से क्या कम है
कि इस ''तर-दामनी में मग़्फ़िरत के दीप जलते हैं
उसे अंदेशा-हा-ए-आबला-पाई 'सहर' क्यों हो
वो जिस के नक़्श-ए-पा से अनगिनत रस्ते निकलते हैं


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