मा'सियत राह की दीवार हुई जाती है

By abdullah-saqibJanuary 6, 2024
मा'सियत राह की दीवार हुई जाती है
अब डगर और भी पुर-ख़ार हुई जाती है
वो क़नाअ'त है तबी'अत में कि वक़्त-ए-रुख़्सत
इक नज़र हासिल-ए-दीदार हुई जाती है


कौन है नग़्मा-सरा आज कि रूह-ए-मुर्दा
रक़्स करती है तो सरशार हुई जाती है
'अक़्ल रक़्बा है कि आबाद हुआ जाता है
दिल 'इमारत है कि मिस्मार हुई जाती है


दो-रुख़े-पन पे ज़रा होने लगा क्या माइल
इक हमिय्यत है कि बेदार हुई जाती है
क्या हुआ तुझ को मिरी हिम्मत-ए-दुश्वार-पसंद
ज़िम्मेदारी भी गिराँ-बार हुई जाती है


कौन से दर पे पटक आऊँ सर-ए-ना-अहलाँ
ख़ुद-पसंदी भी दिल-आज़ार हुई जाती है
कल यही तर्क-ए-त'अल्लुक़ पे मुसिर थी 'साक़िब'
आज देखो यही दिलदार हुई जाती है


19797 viewsghazalHindi