मस्ख़ अल्फ़ाज़ को जैसे हो म'आनी दरकार

By ahmad-ayazFebruary 24, 2025
मस्ख़ अल्फ़ाज़ को जैसे हो म'आनी दरकार
मेरी रूदाद को है एक कहानी दरकार
मुझ में मैं हूँ या कोई और है शामिल मुझ में
अब मिरी ज़ात को है कोई निशानी दरकार


कोई परछाई हटाए कि गिरानी है बहुत
जिस्म-ए-खस्ता को है अब नक़्ल-ए-मकानी दरकार
क्या 'अजब है कि समंदर है जहाँ आब-ए-हयात
तिश्ना-लब को है उसी पानी में पानी दरकार


कुछ ज़ियादा ही क़रीं है वो छुरी शह-रग से
और रग रग में लहू को है रवानी दरकार
इस से पहले कि कोई ख़्वाब धुआँ हो जाए
चश्म-ए-तर को है मिरे अश्क-फ़िशानी दरकार


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