मस्लहत के साथ थे चालाक होना ही पड़ा
By wasim-nadirJanuary 5, 2024
मस्लहत के साथ थे चालाक होना ही पड़ा
चंद पल को ही सही सफ़्फ़ाक होना ही पड़ा
धूल से महफ़ूज़ रखना था मुझे तेरा बदन
इस लिए मुझ को तिरी पोशाक होना ही पड़ा
जुस्तुजू खोए हुए को ढूँड कर लाने की थी
यूँ हुआ इक रोज़ मुझ को ख़ाक होना ही पड़ा
घर की मिट्टी ख़ूबसूरत शक्ल में दिखने लगे
बस इसी ख़्वाहिश में मुझ को चाक होना ही पड़ा
बारिशों में छोड़ कर आने पड़े नन्हे गुलाब
ज़िंदगी तेरे लिए सफ़्फ़ाक होना ही पड़ा
चंद पल को ही सही सफ़्फ़ाक होना ही पड़ा
धूल से महफ़ूज़ रखना था मुझे तेरा बदन
इस लिए मुझ को तिरी पोशाक होना ही पड़ा
जुस्तुजू खोए हुए को ढूँड कर लाने की थी
यूँ हुआ इक रोज़ मुझ को ख़ाक होना ही पड़ा
घर की मिट्टी ख़ूबसूरत शक्ल में दिखने लगे
बस इसी ख़्वाहिश में मुझ को चाक होना ही पड़ा
बारिशों में छोड़ कर आने पड़े नन्हे गुलाब
ज़िंदगी तेरे लिए सफ़्फ़ाक होना ही पड़ा
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