मौसम-ए-गिर्या-ए-सरशार में रो पड़ते हैं

By ahmad-ayazFebruary 24, 2025
मौसम-ए-गिर्या-ए-सरशार में रो पड़ते हैं
ख़ुश-निगर कूचा-ए-अग़यार में रो पड़ते हैं
दर्द जब हद से गुज़र जाए तो हम अहल-ए-सुख़न
मुस्कुराते हुए अश'आर में रो पड़ते हैं


कितना बे-अर्थ है ये आदमियों का जंगल
लोग सद-रौनक़-ए-बाज़ार में रो पड़ते हैं
धूप में जब नहीं दिखते हैं शजर उड़ते परिंद
बैठ कर साया-ए-दीवार में रो पड़ते हैं


ख़ाक हो जाते हैं कुछ फूल चमन-ज़ारों में
और कुछ टूट के गुलज़ार में रो पड़ते हैं
मुंतज़िर जिस के लिए थी ये नज़र सालहा-साल
उस से मिलते हुए बे-कार में रो पड़ते हैं


तंग हो जाती है जब सारी ज़मीं आदम-ज़ाद
सर झुका कर तिरी सरकार में रो पड़ते हैं
62278 viewsghazalHindi