माज़ी के परस्तारों में मुझ को न गिना कर

By ahmar-nadeemFebruary 5, 2024
माज़ी के परस्तारों में मुझ को न गिना कर
मैं हाल हूँ तो हाल के अहवाल कहा कर
ये 'इश्क़ है इक आन में लज़्ज़त नहीं मिलती
क़िस्तों में इसे तू मिरी ऐ जान चखा कर


मज़लूम हवाओं की ख़ता कोई नहीं है
रौशन हुए कुछ लोग चराग़ों को बुझा कर
ये कैसी फ़साहत कि समझ में नहीं आती
तहरीर-ए-मोहब्बत ज़रा आसान लिखा कर


क्या ग़ौर से देखा है कभी चाँद को 'अहमर'
देखे है तुम्हें ख़ुद को वो बादल में छुपा कर
43101 viewsghazalHindi