मेरे ही आँसुओं के शिकस्ता बहाव पर
By umair-ali-anjumJanuary 5, 2024
मेरे ही आँसुओं के शिकस्ता बहाव पर
मुझ को बिठा गया कोई काग़ज़ की नाव पर
मेरे परों को काट के वो साथ ले गया
अब तो मैं उड़ रहा हूँ हवा के दबाव पर
बिगड़ी हुई है चाल कुछ ऐसी तिरे बग़ैर
जैसे मैं चल रहा हूँ सुलगते अलाव पर
कितना हसीन ख़्वाब दिखाई दिया मुझे
मरहम लगा रहा था कोई मेरे घाव पर
मंज़िल तलक पहुँचने का कहता रहा मगर
मुझ से नज़र चुरा गया पहले पड़ाव पर
उस से कहो 'उमैर' वो लौट आए एक बार
आई हुई है ज़िंदगी अब चल-चलाव पर
मुझ को बिठा गया कोई काग़ज़ की नाव पर
मेरे परों को काट के वो साथ ले गया
अब तो मैं उड़ रहा हूँ हवा के दबाव पर
बिगड़ी हुई है चाल कुछ ऐसी तिरे बग़ैर
जैसे मैं चल रहा हूँ सुलगते अलाव पर
कितना हसीन ख़्वाब दिखाई दिया मुझे
मरहम लगा रहा था कोई मेरे घाव पर
मंज़िल तलक पहुँचने का कहता रहा मगर
मुझ से नज़र चुरा गया पहले पड़ाव पर
उस से कहो 'उमैर' वो लौट आए एक बार
आई हुई है ज़िंदगी अब चल-चलाव पर
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