मेरे काँधे पे किसी ख़्वाब का सर रक्खा रहा
By wasim-nadirJanuary 5, 2024
मेरे काँधे पे किसी ख़्वाब का सर रक्खा रहा
और आँखों में सहर होने का डर रक्खा रहा
मैं भटकता ही रहा भूक के सहराओं में
मेरे कमरे में सजा मेरा हुनर रक्खा रहा
कुछ ज़रूरत के सबब मिल तो गए हम दोनों
दिल पे इक बोझ बिछड़ने का मगर रक्खा रहा
लौ चराग़ों की तिरे कपड़े जला सकती है
चाँद तारों पे तिरा ध्यान अगर रक्खा रहा
'उम्र-भर भटके तमन्ना लिए 'नादिर' घर की
एक काग़ज़ पे मगर जेब में घर रक्खा रहा
और आँखों में सहर होने का डर रक्खा रहा
मैं भटकता ही रहा भूक के सहराओं में
मेरे कमरे में सजा मेरा हुनर रक्खा रहा
कुछ ज़रूरत के सबब मिल तो गए हम दोनों
दिल पे इक बोझ बिछड़ने का मगर रक्खा रहा
लौ चराग़ों की तिरे कपड़े जला सकती है
चाँद तारों पे तिरा ध्यान अगर रक्खा रहा
'उम्र-भर भटके तमन्ना लिए 'नादिर' घर की
एक काग़ज़ पे मगर जेब में घर रक्खा रहा
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