मिरे ख़याल की नुदरत किसी को क्या मा'लूम
By muzaffar-hanfiJanuary 4, 2024
मिरे ख़याल की नुदरत किसी को क्या मा'लूम
तिलिस्म-ए-रंग-ए-तमन्ना है अब हुआ मा'लूम
कहीं पनाह नहीं है हमें तो चलना है
अगरचे पैरों में दम है न रास्ता मा'लूम
उसे उड़ा के हवा ले गई न जाने कहाँ
किधर लगाएगा दरिया हमें ख़ुदा मा'लूम
सितारा टूट रहा था तो सब ने देखा था
गया कहाँ ये किसी को न हो सका मा'लूम
उसे किसी को सुना दीजिए दुआ देगा
वो एक नग़्मा है ख़ालिक़ है जिस का ना-मा'लूम
न जाने किस ने 'मुज़फ़्फ़र' की मुख़्बिरी की है
तिरे सिवा तो किसी और को न था मा'लूम
तिलिस्म-ए-रंग-ए-तमन्ना है अब हुआ मा'लूम
कहीं पनाह नहीं है हमें तो चलना है
अगरचे पैरों में दम है न रास्ता मा'लूम
उसे उड़ा के हवा ले गई न जाने कहाँ
किधर लगाएगा दरिया हमें ख़ुदा मा'लूम
सितारा टूट रहा था तो सब ने देखा था
गया कहाँ ये किसी को न हो सका मा'लूम
उसे किसी को सुना दीजिए दुआ देगा
वो एक नग़्मा है ख़ालिक़ है जिस का ना-मा'लूम
न जाने किस ने 'मुज़फ़्फ़र' की मुख़्बिरी की है
तिरे सिवा तो किसी और को न था मा'लूम
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