मेरे ज़ख़्मों को जलाने का इरादा है क्या
By imran-mahmood-maniJanuary 3, 2024
मेरे ज़ख़्मों को जलाने का इरादा है क्या
फिर जिसे तोड़ सको ऐसा ये वा'दा है क्या
कोई मक़्तल में न आया है उठाने के लिए
एक मलिका ने जिसे मारा वो प्यादा है क्या
होश को होश में आने दे उबलते हुए अश्क
क्यों ग़म-ए-यार पिलाते हो ये बादा है क्या
देख तेरी ही तलब दिल के सिवा जाँ भी करे
तू ने समझा ही नहीं इतना ही सादा है क्या
ज़ख़्म-दर-ज़ख़्म हुई रूह बदन से पूछे
खाल से ख़ून टपकता ये लबादा है क्या
कासा-ए-दिल को तिरे दर पे रखा है कब से
झाँक रौज़न से बता तेरा इरादा है क्या
हर घड़ी मेरे ख़द-ओ-ख़ाल बदलते जाएँ
चेहरा झड़ता है हवा से ये बुरादा है क्या
फिर जिसे तोड़ सको ऐसा ये वा'दा है क्या
कोई मक़्तल में न आया है उठाने के लिए
एक मलिका ने जिसे मारा वो प्यादा है क्या
होश को होश में आने दे उबलते हुए अश्क
क्यों ग़म-ए-यार पिलाते हो ये बादा है क्या
देख तेरी ही तलब दिल के सिवा जाँ भी करे
तू ने समझा ही नहीं इतना ही सादा है क्या
ज़ख़्म-दर-ज़ख़्म हुई रूह बदन से पूछे
खाल से ख़ून टपकता ये लबादा है क्या
कासा-ए-दिल को तिरे दर पे रखा है कब से
झाँक रौज़न से बता तेरा इरादा है क्या
हर घड़ी मेरे ख़द-ओ-ख़ाल बदलते जाएँ
चेहरा झड़ता है हवा से ये बुरादा है क्या
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