मेरी पलकों की दहलीज़ पर इस तरह मेरे अश्कों न तुम जगमगाते रहो
By aalam-nizamiJanuary 18, 2024
मेरी पलकों की दहलीज़ पर इस तरह मेरे अश्कों न तुम जगमगाते रहो
कैफ़ियत दिल की ज़ाहिर किसी पर न हो ग़म ख़ुशी की झलक में छुपाते रहो
डगमगाने न दो हौसलों के क़दम अपनी हिम्मत का रखना है तुम को भरम
बिजलियाँ आशियाना जलाती रहें तुम नया आशियाना बनाते रहो
कर दें वीराँ न ये अम्न की बस्तियाँ बुग़्ज़-ओ-नफ़रत की ये सर-फिरी आँधियाँ
इन को रखना है तुम को जो औक़ात में तुम चराग़-ए-मोहब्बत जलाते रहो
क्या ख़बर क्या हैं ऐसी भी मजबूरियाँ बढ़ गईं ख़ूनी रिश्तों में भी दूरियाँ
दोस्तो ये तक़ाज़ा है हालात का दूरियाँ तुम दिलों की मिटाते रहो
सर कटे या रहे इस का ग़म न करो ज़ुल्म के सामने तुम कहीं न झुको
जो ग़लत है तुम उस की मज़म्मत करो और आवाज़-ए-हक़ भी उठाते रहो
जी लो ख़ुद के लिए कुछ नहीं फ़ाएदा ज़िंदगी का है 'आलम' यही क़ा'एदा
मक़्सद-ए-ज़िंदगी होगा हासिल तुम्हें दूसरों के सदा काम आते रहो
कैफ़ियत दिल की ज़ाहिर किसी पर न हो ग़म ख़ुशी की झलक में छुपाते रहो
डगमगाने न दो हौसलों के क़दम अपनी हिम्मत का रखना है तुम को भरम
बिजलियाँ आशियाना जलाती रहें तुम नया आशियाना बनाते रहो
कर दें वीराँ न ये अम्न की बस्तियाँ बुग़्ज़-ओ-नफ़रत की ये सर-फिरी आँधियाँ
इन को रखना है तुम को जो औक़ात में तुम चराग़-ए-मोहब्बत जलाते रहो
क्या ख़बर क्या हैं ऐसी भी मजबूरियाँ बढ़ गईं ख़ूनी रिश्तों में भी दूरियाँ
दोस्तो ये तक़ाज़ा है हालात का दूरियाँ तुम दिलों की मिटाते रहो
सर कटे या रहे इस का ग़म न करो ज़ुल्म के सामने तुम कहीं न झुको
जो ग़लत है तुम उस की मज़म्मत करो और आवाज़-ए-हक़ भी उठाते रहो
जी लो ख़ुद के लिए कुछ नहीं फ़ाएदा ज़िंदगी का है 'आलम' यही क़ा'एदा
मक़्सद-ए-ज़िंदगी होगा हासिल तुम्हें दूसरों के सदा काम आते रहो
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