मोहब्बत से जुनूँ की दास्ताँ तक आ गया हूँ मैं

By balbir-rathiJanuary 2, 2024
मोहब्बत से जुनूँ की दास्ताँ तक आ गया हूँ मैं
किसी के 'इश्क़ में देखो कहाँ तक आ गया हूँ मैं
ये राहें ख़ुद-बख़ुद कैसे मुनव्वर हो उठीं या-रब
गुमाँ होता है मंज़िल के निशाँ तक आ गया हूँ मैं


किसे मा'लूम था जज़्बात ये भी रंग लाएँगे
जुनूँ में अब किसी के इम्तिहाँ तक आ गया हूँ मैं
कभी इक दर्द बन कर सिर्फ़ उन के दिल में पिन्हाँ था
मगर अब गीत बन कर हर ज़बाँ तक आ गया हूँ मैं


नहीं वो बात ही कुछ और थी जिस की तमन्ना थी
यूँ ही जज़्बात की रौ में यहाँ तक आ गया हूँ मैं
तुम्हारी इन हसीं मख़मूर आँखों की क़सम हमदम
वहीं तक राह-ए-उल्फ़त है जहाँ तक आ गया हूँ मैं


कहीं मंज़िल से आगे ही न आ पहुँचा हूँ मैं यारो
ज़रा आवाज़ दो मुझ को कहाँ तक आ गया हूँ मैं
तमन्ना है उफ़ुक़ के धुँदले पर्दे चाक कर डालूँ
किसी की जुस्तुजू में अब यहाँ तक आ गया हूँ मैं


24996 viewsghazalHindi