मुझ सा गुल-बर्ज़-ओ-गुल-अफ़्कार गुलिस्ताँ में नहीं

By ustad-azmat-hussain-khanJanuary 5, 2024
मुझ सा गुल-बर्ज़-ओ-गुल-अफ़्कार गुलिस्ताँ में नहीं
फूल ही फूल हैं काँटे मिरे दामाँ में नहीं
या बता दीजिए ये रंग-ए-तग़ाफ़ुल कब तक
या ये कह दीजिए कुछ आप के इम्काँ में नहीं


दिल परेशान है माहौल की ग़म-नाकी से
अब मिरे साथ का क़ैदी कोई ज़िंदाँ में नहीं
आदमिय्यत की ये तौहीन ये तख़रीब अफ़सोस
और सब कुछ है मोहब्बत दिल-ए-इंसाँ में नहीं


आ मैं समझाऊँ तुझे ग़ायत-ए-सज्दा क्या है
ख़ुद कशिश सर में हो संग-ए-दर-ए-जानाँ में नहीं
अपने माज़ी पे न रो हाल को रख पेश-ए-नज़र
उस सफ़ीने की तरफ़ देख जो तूफ़ाँ में नहीं


रुख़ हवाओं ने इस अंदाज़ से बदला 'मैकश'
कोई आसूदा-नशेमन ही गुलिस्ताँ में नहीं
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