मुझ से जो तू हर गाम पे यूँ बोल रहा है
By saqib-qamri-misbahiJanuary 4, 2024
मुझ से जो तू हर गाम पे यूँ बोल रहा है
दर-अस्ल तिरा जहल-ए-दरूँ बोल रहा है
मैं हूँ तिरी हर बात की तफ़्सील का तालिब
और तू है कि हर बात पे हूँ बोल रहा है
इक फ़र्द है महबूस-ए-फ़ुसूँ-साज़ी-ए-वहशत
इक शख़्स ख़िरद को भी जुनूँ बोल रहा है
क़ातिल को मुकाफ़ात-ए-‘अमल मिल के रहेगी
मक़्तूल का हर क़तरा-ए-ख़ूँ बोल रहा है
वो अपने गरेबान में भी झाँक के देखे
जो आज मुझे ख़्वार-ओ-ज़बूँ बोल रहा है
मैं मस्लहतन आज ज़रा चुप जो हूँ 'साक़िब'
इक शख़्स यहाँ हद से फ़ुज़ूँ बोल रहा है
दर-अस्ल तिरा जहल-ए-दरूँ बोल रहा है
मैं हूँ तिरी हर बात की तफ़्सील का तालिब
और तू है कि हर बात पे हूँ बोल रहा है
इक फ़र्द है महबूस-ए-फ़ुसूँ-साज़ी-ए-वहशत
इक शख़्स ख़िरद को भी जुनूँ बोल रहा है
क़ातिल को मुकाफ़ात-ए-‘अमल मिल के रहेगी
मक़्तूल का हर क़तरा-ए-ख़ूँ बोल रहा है
वो अपने गरेबान में भी झाँक के देखे
जो आज मुझे ख़्वार-ओ-ज़बूँ बोल रहा है
मैं मस्लहतन आज ज़रा चुप जो हूँ 'साक़िब'
इक शख़्स यहाँ हद से फ़ुज़ूँ बोल रहा है
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