न ख़ल्वत रास आती है न हम महफ़िल में रहते हैं

By nasir-misbahiJanuary 4, 2024
न ख़ल्वत रास आती है न हम महफ़िल में रहते हैं
ये आख़िर कौन छुप-छुप कर हमारे दिल में रहते हैं
घुटन बे-ताबियाँ आठों पहर की बे-दिली आहें
लगा कर तुम से दिल हम किस क़दर मुश्किल में रहते हैं


हमारे हम-नशीनों में तुम्हीं हो रौनक़-ए-महफ़िल
ये बाक़ी क़ुमक़ुमे हैं ज़ीनत-ए-महफ़िल में रहते हैं
ये शहर-ए-हुस्न है अहल-ए-जुनूँ की बात रहने दो
यहाँ तो सादा-दिल भी नर्ग़ा-ए-क़ातिल में रहते हैं


जुनूँ चाक-ए-गरेबाँ सर पे बाँधे ख़ून उगलता है
मुग़ीलानान-ए-लैलाई पड़े महमिल में रहते हैं
जो पलकों तक चले आते हैं लेकिन बह नहीं पाते
वो आँसू दर्द के साँचे में ढल कर दिल में रहते हैं


हरीफ़-ए-मौज-ए-दरिया सब हैं लेकिन देखना ये है
भँवर में कितने कितने गोशा-ए-साहिल में रहते हैं
मह-ए-ताबाँ हैं हम ताबिंदगी रग-रग में है फिर भी
सितारों की निकलती डूबती झिलमिल में रहते हैं


यहाँ जादू-बयाँ कहते हैं अहल-ए-हर्फ़ को 'नासिर'
हुनर वाले हमेशा जेहद-ए-ला-हासिल में रहते हैं
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