न वो मय-फ़रोश होते न मैं बादा-ख़्वार होता
By bashir-farooqJanuary 2, 2024
न वो मय-फ़रोश होते न मैं बादा-ख़्वार होता
न वो मस्त-ए-नाज़ होते न मुझे ख़ुमार होता
मुझे ता-हयात रहता तिरा इंतिज़ार पैहम
अगर अपनी ज़िंदगी पर कोई ए'तिबार होता
ग़म-ए-इंतिज़ार क्या है ये रुमूज़ तुझ पे खुलते
तुझे भी किसी का ज़ालिम अगर इंतिज़ार होता
उन्हें इस क़दर न होता ये ग़ुरूर-ए-बे-नियाज़ी
मुझे अपने जज़्ब-ए-दिल पर अगर इख़्तियार होता
मिरे शौक़-ए-बेकराँ की कोई इंतिहा न होती
मिरे हल्क़ा-ए-जुनूँ का न कहीं हिसार होता
इन्हीं हसरतों में गुज़रे मिरी ज़िंदगी के लम्हे
कोई दिल-नवाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता
यही आरज़ू है या-रब मिरे जज़्बा-ए-दरूँ की
मिरी ज़ात पर मदार-ए-ग़म-ए-रोज़गार होता
कोई जल्वा-रेज़ होता मिरी बज़्म-ए-आरज़ू में
मिरे दिल की अंजुमन में कोई नग़्मा-बार होता
न वो मस्त-ए-नाज़ होते न मुझे ख़ुमार होता
मुझे ता-हयात रहता तिरा इंतिज़ार पैहम
अगर अपनी ज़िंदगी पर कोई ए'तिबार होता
ग़म-ए-इंतिज़ार क्या है ये रुमूज़ तुझ पे खुलते
तुझे भी किसी का ज़ालिम अगर इंतिज़ार होता
उन्हें इस क़दर न होता ये ग़ुरूर-ए-बे-नियाज़ी
मुझे अपने जज़्ब-ए-दिल पर अगर इख़्तियार होता
मिरे शौक़-ए-बेकराँ की कोई इंतिहा न होती
मिरे हल्क़ा-ए-जुनूँ का न कहीं हिसार होता
इन्हीं हसरतों में गुज़रे मिरी ज़िंदगी के लम्हे
कोई दिल-नवाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता
यही आरज़ू है या-रब मिरे जज़्बा-ए-दरूँ की
मिरी ज़ात पर मदार-ए-ग़म-ए-रोज़गार होता
कोई जल्वा-रेज़ होता मिरी बज़्म-ए-आरज़ू में
मिरे दिल की अंजुमन में कोई नग़्मा-बार होता
21075 viewsghazal • Hindi