नर्ग़ा-ए-ज़ुल्मत-ए-शब से मैं सहर बन के उठा

By shehzad-anjum-burhaniJanuary 5, 2024
नर्ग़ा-ए-ज़ुल्मत-ए-शब से मैं सहर बन के उठा
अहल-ए-ग़फ़लत के लिए ताज़ा ख़बर बन के उठा
ये भी इक तुरफ़ा-तमाशा है तिरी महफ़िल में
जब भी मैं बैठा हूँ आशोब-ए-नज़र बन के उठा


जो मिरी जान का दुश्मन था हुआ है यूँ भी
सख़्त मुश्किल में वही मेरी सिपर बन के उठा
अर्ज़-ए-तख़्लीक़ थी सुनसान तभी कोई ख़याल
इक बगूला सा सर-ए-राहगुज़र बन के उठा


फिर किसी याद से बिफरी हैं लहू की मौजें
फिर कोई दर्द सा सीने में भँवर बन के उठा
तेरी बख़्शिश के भी अंदाज़ निराले हैं बहुत
कोई दीवाना कोई अहल-ए-नज़र बन के उठा


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