नज़र जिस वक़्त भी उन से मिली है

By ustad-azmat-hussain-khanJanuary 5, 2024
नज़र जिस वक़्त भी उन से मिली है
'अजब मस्ती का 'आलम दे गई है
सुकून-ए-दिल की हो कोई तो सूरत
ग़म-ए-दौराँ वबाल-ए-ज़िंदगी है


निगाहें तिश्ना पैमाने हैं ख़ाली
ये मयख़ाने में कैसी बेबसी है
मयस्सर हो अगर बेदारी-ए-दिल
तो हर ज़र्रे में शानदर-ए-दिलबरी है


समझता जा रहा हूँ ग़म की 'अज़्मत
यही अब तर्जुमान-ए-ज़िंदगी है
मैं अपनी धुन में आगे बढ़ गया था
मुझे मंज़िल ने ख़ुद आवाज़ दी है


न घबरा रात की महरूमियों से
इन्हीं तारीकियों में रौशनी है
इसे अरबाब-ए-मय-ख़ाना न भूलें
कि 'मैकश' महरम-ए-बादा-कशी है


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