निगाह पर जो पड़ रही थी धूल से निकल गए
By hasrat-khan-khatakJanuary 3, 2024
निगाह पर जो पड़ रही थी धूल से निकल गए
समझ रहे थे सब ग़लत कि भूल से निकल गए
ये माहताब-ए-शम्स है ये आफ़्ताब-ए-फ़िक्र-ओ-फ़न
हिजाब-ए-जाँ रहा नहीं क़ुबूल से निकल गए
ये 'आशिक़ी के फ़लसफ़े यक़ीन-दर-यक़ीं गुमाँ
पढ़ा नहीं था ज़ाबता सकूल से निकल गए
झुका नहीं सका कोई सिवा ख़ुदा के नाख़ुदा
उसूल पर डटे रहे उसूल से निकल गए
मलाल-ए-जाँ न था कभी न है न हो सका कभी
मलाल-ए-दिल का शुक्रिया मलूल से निकल गए
किया तो 'इश्क़ ही किया कभी रखा न फ़ासला
सो वस्ल से विसाल से वसूल से निकल गए
बबूल भी क़ुबूल हैं क़ुबूल हैं बबूल भी
मगर न जाने क्या हुआ वो फूल से निकल गए
न हसरत-ए-तलब रही न क़ल्ब में ख़लिश कोई
हिसाब-ए-जाँ पे नाज़ है हुसूल से निकल गए
समझ रहे थे सब ग़लत कि भूल से निकल गए
ये माहताब-ए-शम्स है ये आफ़्ताब-ए-फ़िक्र-ओ-फ़न
हिजाब-ए-जाँ रहा नहीं क़ुबूल से निकल गए
ये 'आशिक़ी के फ़लसफ़े यक़ीन-दर-यक़ीं गुमाँ
पढ़ा नहीं था ज़ाबता सकूल से निकल गए
झुका नहीं सका कोई सिवा ख़ुदा के नाख़ुदा
उसूल पर डटे रहे उसूल से निकल गए
मलाल-ए-जाँ न था कभी न है न हो सका कभी
मलाल-ए-दिल का शुक्रिया मलूल से निकल गए
किया तो 'इश्क़ ही किया कभी रखा न फ़ासला
सो वस्ल से विसाल से वसूल से निकल गए
बबूल भी क़ुबूल हैं क़ुबूल हैं बबूल भी
मगर न जाने क्या हुआ वो फूल से निकल गए
न हसरत-ए-तलब रही न क़ल्ब में ख़लिश कोई
हिसाब-ए-जाँ पे नाज़ है हुसूल से निकल गए
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