नूर की किरन उस से ख़ुद निकलती रहती है

By ejaz-siddiqiJanuary 19, 2024
नूर की किरन उस से ख़ुद निकलती रहती है
वक़्त कटता रहता है रात ढलती रहती है
और ज़िक्र क्या कीजे अपने दिल की हालत का
कुछ बिगड़ती रहती है कुछ सँभलती रहती है


ज़ेहन उभार देता है नक़्श हाल-ओ-माज़ी के
इन दिनों तबी'अत कुछ यूँ बहलती रहती है
तह-नशीन मौजें तो पुर-सुकून रहती हैं
और सत्ह-ए-दरिया की मौज उछलती रहती हैं


ज़िंदगी 'इबारत है ज़िंदगी के मोड़ों से
पेच-ओ-ख़म हों कितने ही राह चलती रहती है
चाहे अपने ग़म की हो या ग़म-ए-ज़माना की
बात तो बहर-सूरत कुछ निकलती रहती है


ज़िंदगी है नाम इस का ताज़गी है काम इस का
एक मौज-ए-ख़ूँ दिल से जो उबलती रहती है
कैफ़ भी है मस्ती भी ज़हर भी है अमृत भी
वो जो जाम-ए-साक़ी से रोज़ ढलती रहती है


ख़ुद वजूदियत हो ये या हो उस की तन्हाई
रूह को मगर कोई शय मसलती रहती है
आज भी बुरी क्या है कल भी ये बुरी क्या थी
इस का नाम दुनिया है ये बदलती रहती है


होती है वो शे'रों में मुन’अकिस कभी 'ए'जाज़'
मुद्दतों घुटन सी जो दिल में पलती रहती है
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