पहले ये अना ताक़ पे धरना ही पड़ेगी
By syed-masood-naqviJanuary 5, 2024
पहले ये अना ताक़ पे धरना ही पड़ेगी
तब जा के कहीं हम को फ़क़ीरी ये मिलेगी
दादी ने मिरे सामने इक रोज़ कहा था
ये आज की ‘औरत है ये ना-हक़ न दबेगी
देते हैं जहाँ पेड़ परिंदों को इशारा
सय्याद की ऐसी जगह हरगिज़ न चलेगी
शिद्दत की है ख़्वाहिश कि मिले आब-ए-हयात आज
है 'उम्र को मा'लूम कि इक रोज़ ढलेगी
आने लगी हैं अब तो मदीने से सदाएँ
ऐ ज़िंदगी अब तुझ से मिरी ख़ूब जमेगी
साया है मिरे सर पे बुज़ुर्गों का हमेशा
ऐ वक़्त मिरे सामने तेरी न चलेगी
तब जा के कहीं हम को फ़क़ीरी ये मिलेगी
दादी ने मिरे सामने इक रोज़ कहा था
ये आज की ‘औरत है ये ना-हक़ न दबेगी
देते हैं जहाँ पेड़ परिंदों को इशारा
सय्याद की ऐसी जगह हरगिज़ न चलेगी
शिद्दत की है ख़्वाहिश कि मिले आब-ए-हयात आज
है 'उम्र को मा'लूम कि इक रोज़ ढलेगी
आने लगी हैं अब तो मदीने से सदाएँ
ऐ ज़िंदगी अब तुझ से मिरी ख़ूब जमेगी
साया है मिरे सर पे बुज़ुर्गों का हमेशा
ऐ वक़्त मिरे सामने तेरी न चलेगी
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