पत्थर है ये कभी कभी शीशा है आदमी
By shad-nimbahediJanuary 5, 2024
पत्थर है ये कभी कभी शीशा है आदमी
है जो ब'ईद-ए-'अक़्ल मु'अम्मा है आदमी
सुब्ह-ओ-मसा तलब में भटकता है आदमी
कब राज़-ए-काएनात को समझा है आदमी
पहले करे तो नामा-ए-आ'माल ख़ुशनुमा
जन्नत की आरज़ू में तो मरता है आदमी
पामाली-ए-ज़मीर पे रोता है ख़ून-ए-दिल
जब भी किसी नज़र से उतरता है आदमी
रिश्ता हुआ शिकस्ता मुरव्वत न कुछ लिहाज़
आबादियों के शहर में तन्हा है आदमी
पाता है सरफ़राज़ियाँ रब्ब-ए-जलील से
ऐ 'शाद' जब सुजूद में झुकता है आदमी
है जो ब'ईद-ए-'अक़्ल मु'अम्मा है आदमी
सुब्ह-ओ-मसा तलब में भटकता है आदमी
कब राज़-ए-काएनात को समझा है आदमी
पहले करे तो नामा-ए-आ'माल ख़ुशनुमा
जन्नत की आरज़ू में तो मरता है आदमी
पामाली-ए-ज़मीर पे रोता है ख़ून-ए-दिल
जब भी किसी नज़र से उतरता है आदमी
रिश्ता हुआ शिकस्ता मुरव्वत न कुछ लिहाज़
आबादियों के शहर में तन्हा है आदमी
पाता है सरफ़राज़ियाँ रब्ब-ए-जलील से
ऐ 'शाद' जब सुजूद में झुकता है आदमी
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