फेंका हुआ गुल भी तिरा पत्थर का मज़ा दे

By baqar-naqviJanuary 2, 2024
फेंका हुआ गुल भी तिरा पत्थर का मज़ा दे
वो बात भी कह डाल जो ख़ंजर का मज़ा दे
दरिया को खँगालूँ भी तो कुछ हाथ न आए
इक अश्क को चक्खूँ तो समुंदर का मज़ा दे


लुट जाए न बेचारा मुसाफ़िर तो करे क्या
परदेस की हर चीज़ अगर घर का मज़ा दे
फूलों से भरी सेज को तू अपने लिए रख
योगी हूँ मुझे काँटों के बिस्तर का मज़ा दे


बिठला दे किसी चलती हुई राह पे इक दिन
आँखों को धड़कते हुए मंज़र का मज़ा दे
उड़ते हुए गिर जाऊँ सँभल जाऊँ उड़ूँ फिर
परवाज़ कभी टूटे हुए पर का मज़ा दे


फिर देखेंगे हम भी तिरी ईमाँ-तलबी को
इक बार तो अल्लाह तुझे ज़र का मज़ा दे
ऐ काश मैं 'बाक़र' कभी वो शे'र भी लिख्खूँ
एहसास को जो ज़मज़म-ओ-कौसर का मज़ा दे


49691 viewsghazalHindi