फिरते हैं अब भी दिल को गरेबाँ किए हुए

By ahmad-farazFebruary 24, 2025
फिरते हैं अब भी दिल को गरेबाँ किए हुए
जिन वहशियों पे हैं तिरे एहसाँ किए हुए
तज्दीद-ए-'इश्क़ क्या हो के बरसों गुज़र गए
तुझ से कोई सुख़न भी मिरी जाँ किए हुए


अब तुझ से क्या गिला हो के इक 'उम्र हो गई
हम को भी क़स्द-ए-कूचा-ए-जानाँ किए हुए
दिल से हुई है फिर तिरे बारे में गुफ़्तुगू
तर आँसुओं से दीदा-ओ-दामाँ किए हुए


जी मानता नहीं है कि हम भी भुला चुकें
तेरी तरह से वा'दा-ओ-पैमाँ किए हुए
कुछ ज़िद में नासेहों की तुझे चाहते रहे
कुछ पासदारी-ए-दिल-ए-नादाँ किए हुए


हम वो कि तुझ को शे'र में तस्वीर कर दिया
सूरत-गरान-ए-शहर को हैराँ किए हुए
बाज़ार सर्द था न ख़रीदार कम-नज़र
हम ख़ुद थे अपने आप को अर्ज़ां किए हुए


ऐ 'इश्क़ हम से और भी होंगे ज़माने में
अच्छे-भले घरों को बयाबाँ किए हुए
कुछ हम से ना-मुराद कि फिरते हैं कू-ब-कू
दिल को किसी फ़क़ीर का दामाँ किए हुए


वा'दा किया था उस ने किसी शाम का कभी
हम आज तक हैं घर में चराग़ाँ किए हुए
अब उस के जौर से भी गए हम कि जब से हैं
अपने किए पे उस को पशेमाँ किए हुए


ये रतजगे क़ुबूल कि आराम से तो हैं
रखते थे वर्ना ख़्वाब परेशाँ किए हुए
हम वो असीर हैं कि ज़माने गुज़र गए
बंद अपने आप पर दर-ए-ज़िंदाँ किए हुए


तर्क-ए-वफ़ा के बा'द हवस इख़्तियार की
इस कारोबार में भी हैं नुक़साँ किए हुए
जान-ए-'फ़राज़' मर्ग-ए-तमन्ना के बावजूद
भूले नहीं हमीं तिरे एहसाँ किए हुए


46528 viewsghazalHindi