पिंजरे से क़फ़स से तो कभी जाल से उभरे
By shahbaz-choudharyJanuary 5, 2024
पिंजरे से क़फ़स से तो कभी जाल से उभरे
किस किस को बताएँ कि हैं किस हाल से उभरे
हम पिछली ख़िज़ाओं के सितम-ज़ादा शगूफ़े
हम अगली रुतों में जो नई डाल से उभरे
हम कोह-ए-गिराँ बन के कभी सू-ए-ज़मीं पर
बन कर कभी लावा हमी पाताल से उभरे
हम अहल-ए-सदाक़त ही रहे शाह के मुनकिर
दरबार में जो मारे तो चौपाल से उभरे
नाकाम मोहब्बत के हैं हम छेड़े हुए गीत
साज़िंदों के सुर से तो कभी ताल से उभरे
हैं मुझ से निचोड़े हुए ख़ूँ का हैं नतीजा
वो रंग जो हैं तेरे ख़द-ओ-ख़ाल से उभरे
हम शो'बदा-गर के रहे हाथों में खिलौने
आवाज़ पे ताली की जो रूमाल से उभरे
किस किस को बताएँ कि हैं किस हाल से उभरे
हम पिछली ख़िज़ाओं के सितम-ज़ादा शगूफ़े
हम अगली रुतों में जो नई डाल से उभरे
हम कोह-ए-गिराँ बन के कभी सू-ए-ज़मीं पर
बन कर कभी लावा हमी पाताल से उभरे
हम अहल-ए-सदाक़त ही रहे शाह के मुनकिर
दरबार में जो मारे तो चौपाल से उभरे
नाकाम मोहब्बत के हैं हम छेड़े हुए गीत
साज़िंदों के सुर से तो कभी ताल से उभरे
हैं मुझ से निचोड़े हुए ख़ूँ का हैं नतीजा
वो रंग जो हैं तेरे ख़द-ओ-ख़ाल से उभरे
हम शो'बदा-गर के रहे हाथों में खिलौने
आवाज़ पे ताली की जो रूमाल से उभरे
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