पुर है दामन चमन का ख़ारों से

By iram-lakhnaviJanuary 3, 2024
पुर है दामन चमन का ख़ारों से
दम उलझता है इन बहारों से
क्या शिकायत फ़रेब खाने की
साबिक़ा है फ़रेब-कारों से


यास को हम ने दूर ही रक्खा
काम जब तक चला सहारों से
बीच दरिया में डूबने वाले
क्या त'अल्लुक़ हमें किनारों से


ऐ शब-ए-ग़म ये देखता क्या हूँ
रौशनी छिन गई सितारों से
सैर-ए-नज़्ज़ारगी नहीं होती
कोई कह दे तिरे नज़ारों से


लोग सुन सुन के मुस्कुराते हैं
वक़्त की मद्ह बे-क़रारों से
बस उसी एक से है काम 'इरम'
कौन उलझा करे हज़ारों से


56259 viewsghazalHindi