क़र्या-ए-जाँ से हो कर गुज़रता था जो रास्ता या-अख़ी
By shehzad-anjum-burhaniJanuary 5, 2024
क़र्या-ए-जाँ से हो कर गुज़रता था जो रास्ता या-अख़ी
एक साया बहुत देर उस पर टहलता रहा या-अख़ी
अपने ही आप से देर तक हम भी दस्त-ओ-गरेबाँ रहे
धुंद छटने लगी और सूरज निकलने लगा या-अख़ी
ना-रसाई का एहसास भी दरमियान-ए-यक़ीं आ गया
चंद क़दमों पे मंज़िल थी और रास्ता खो गया या-अख़ी
हम कि अब्र-ए-करम की तमन्ना में दश्त-ओ-जबल तक गए
एक तूफ़ाँ ग़ुबार-आश्ना कर गया था फ़ज़ा या-अख़ी
अब तो जाँ तक उतरने लगा ख़ुद-कलामी का दुख क्या कहें
इतना आसाँ नहीं अपने ही आप से बोलना या-अख़ी
जिस के हाथों में डाले हुए हाथ फिरते थे हम रात-दिन
क्या तुम्हें याद है तुम बताओ कि वो कौन था या-अख़ी
ख़ुद-फ़रेबी ही इस 'अह्द में ज़िंदा रहने का सामान है
मर ही जाएँ अगर छोड़ दें ख़्वाब का देखना या-अख़ी
एक साया बहुत देर उस पर टहलता रहा या-अख़ी
अपने ही आप से देर तक हम भी दस्त-ओ-गरेबाँ रहे
धुंद छटने लगी और सूरज निकलने लगा या-अख़ी
ना-रसाई का एहसास भी दरमियान-ए-यक़ीं आ गया
चंद क़दमों पे मंज़िल थी और रास्ता खो गया या-अख़ी
हम कि अब्र-ए-करम की तमन्ना में दश्त-ओ-जबल तक गए
एक तूफ़ाँ ग़ुबार-आश्ना कर गया था फ़ज़ा या-अख़ी
अब तो जाँ तक उतरने लगा ख़ुद-कलामी का दुख क्या कहें
इतना आसाँ नहीं अपने ही आप से बोलना या-अख़ी
जिस के हाथों में डाले हुए हाथ फिरते थे हम रात-दिन
क्या तुम्हें याद है तुम बताओ कि वो कौन था या-अख़ी
ख़ुद-फ़रेबी ही इस 'अह्द में ज़िंदा रहने का सामान है
मर ही जाएँ अगर छोड़ दें ख़्वाब का देखना या-अख़ी
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