क़िस्मत की लकीरों के सितम हम ने सहे हैं

By syed-waseem-naqviJanuary 5, 2024
क़िस्मत की लकीरों के सितम हम ने सहे हैं
दरिया थे कभी हम भी पर अब प्यासे खड़े हैं
सहरा में दिया बन के जिन्हें रस्ता दिखाया
वो लोग हवाओं के क़बीले में खड़े हैं


बस्ती में हमारी हैं बहुत चाँद सितारे
सूरज के इशारों पे मगर चलने लगे हैं
दस्तार को क़दमों में किसी के नहीं रक्खा
ये बात अलग है कि ग़रीबी में पले हैं


तुम आइनों को ज़ंग लगा कर कहीं रख दो
हम आइनों से बात तिरी करने लगे हैं
ख़्वाबों के पुलंदे को लिए साथ में तन्हा
ता'बीर के बाज़ार में बरसों से खड़े हैं


ख़्वाबों में हर इक रात तिरा आ के सताना
बे-साख़्ता हर ख़्वाब पे हम हँसने लगे हैं
ये नूर जो उठता हुआ तुम देख रहे हो
ये अश्क हमारे हैं जो आँखों से ढले हैं


वो घर जो बुज़ुर्गों ने बनाया था लहू से
दिन-रात 'वसीम' उस की मरम्मत में लगे हैं
13193 viewsghazalHindi