राज़-ए-उल्फ़त को छुपाया है जफ़ा-जू हम ने
By ishrat-jahangirpuriJanuary 3, 2024
राज़-ए-उल्फ़त को छुपाया है जफ़ा-जू हम ने
हर सितम पर जो पिए ख़ून के आँसू हम ने
बाल-ओ-पर ग़ौर से सय्याद ने देखे बढ़ कर
जब हिलाए हैं क़फ़स में कभी बाज़ू हम ने
पर्दा-ए-अब्र-ए-सियह जैसे मह-ए-ताबाँ पर
तेरे 'आरिज़ पे यूँही देखे हैं गेसू हम ने
एक पहलू भी शब-ए-ग़म ने न बदला अफ़सोस
हो के बेताब बहुत बदले हैं पहलू हम ने
बढ़ के ख़ुद तू ने सफ़ीने किए नज़्र-ए-तूफ़ाँ
नाख़ुदा ऐसी भी देखी है तिरी ख़ू हम ने
बज़्म में तुझ को न पाया तो ब-आदाब-ए-वफ़ा
ढूँढा दुज़दीदा-निगाही से हर इक सू हम ने
जुरअत-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना कभी रास आ न सकी
दिल पे पाया न तिरे सामने क़ाबू हम ने
जिस पे पड़ जाएँ वो आईना-ए-हैरत बन जाए
देखा है उन की निगाहों का ये जादू हम ने
बे-अदब कह के उन्हों ने हमें टोका 'इशरत'
प्यार में कह दिया जब तुम के 'एवज़ तू हम ने
हर सितम पर जो पिए ख़ून के आँसू हम ने
बाल-ओ-पर ग़ौर से सय्याद ने देखे बढ़ कर
जब हिलाए हैं क़फ़स में कभी बाज़ू हम ने
पर्दा-ए-अब्र-ए-सियह जैसे मह-ए-ताबाँ पर
तेरे 'आरिज़ पे यूँही देखे हैं गेसू हम ने
एक पहलू भी शब-ए-ग़म ने न बदला अफ़सोस
हो के बेताब बहुत बदले हैं पहलू हम ने
बढ़ के ख़ुद तू ने सफ़ीने किए नज़्र-ए-तूफ़ाँ
नाख़ुदा ऐसी भी देखी है तिरी ख़ू हम ने
बज़्म में तुझ को न पाया तो ब-आदाब-ए-वफ़ा
ढूँढा दुज़दीदा-निगाही से हर इक सू हम ने
जुरअत-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना कभी रास आ न सकी
दिल पे पाया न तिरे सामने क़ाबू हम ने
जिस पे पड़ जाएँ वो आईना-ए-हैरत बन जाए
देखा है उन की निगाहों का ये जादू हम ने
बे-अदब कह के उन्हों ने हमें टोका 'इशरत'
प्यार में कह दिया जब तुम के 'एवज़ तू हम ने
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