रह-ए-हयात में ऐसे मक़ाम भी निकले

By ustad-azmat-hussain-khanJanuary 5, 2024
रह-ए-हयात में ऐसे मक़ाम भी निकले
जहाँ भटकते हुए सुब्ह-ओ-शाम भी निकले
'अजीब चीज़ है नज़रों की पुख़्ता-गीरी भी
जो पुख़्ता-कार बहुत थे वो ख़ाम भी निकले


मिरे लबों पे तिरा नाम है तो लुत्फ़ ही क्या
तिरी ज़बाँ से कभी मेरा नाम भी निकले
ये क्या कि फ़ुर्क़त-ए-पैहम ही ज़िंदगी बन जाए
कभी तो राह-ए-सलाम-ओ-पयाम भी निकले


तमाम रात जहाँ मय-कशों का मजमा' था
वहीं से ज़ाहिद-ए-सद-एहतिराम भी निकले
मुदाम पीते रहें चंद लोग ही साक़ी
तिरी तरफ़ से कभी इज़्न-ए-‘आम भी निकले


बना लिया है जहाँ आदमी ने जादा-ए-ख़ास
उसी की सम्त कोई राह-ए-‘आम भी निकले
किया जो ग़ौर तिरी बे-कराँ तजल्ली पर
तो दिल के साथ कई और मक़ाम भी निकले


किसी के बस में नहीं कामयाबी-ए-मंज़िल
जो सुस्त-रौ थे वही तेज़-गाम भी निकले
इसी लिए तो हूँ पाबंद-ए-मै-कदा 'मैकश'
उसी की शाम से अब सुब्ह-ए-बाम भी निकले


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