रंग-बिरंगे नक़्श उभर कर तैर रहे हैं पानी पर

By wasim-nadirJanuary 5, 2024
रंग-बिरंगे नक़्श उभर कर तैर रहे हैं पानी पर
चाँद ने अपनी मुहर लगा दी दरिया की पेशानी पर
तुम क्या जानो तुम क्या समझो 'इश्क़ इसी को कहते हैं
हम ने अपनी 'उम्र गुज़ारी कैसे एक कहानी पर


आख़िर मैं ने ख़ून से अपने वो तस्वीर मुकम्मल की
कब तक बेबस बैठा रहता रंगों की मन-मानी पर
नस्लें वहशी हो जाती हैं यार हिफ़ाज़त करने में
ख़ुश होने की बात नहीं है सहरा की सुल्तानी पर


कब तक खंडर अपनी कहानी हमें सुनाएगा 'नादिर'
कब तक आँखें जमी रहेंगी देखें इस वीरानी पर
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