रेज़ा रेज़ा मैं सर-ए-राह बिखर जाऊँगा
By faisal-farooqJanuary 2, 2024
रेज़ा रेज़ा मैं सर-ए-राह बिखर जाऊँगा
तुम से गर दूर रहूँगा तो मैं मर जाऊँगा
शाम आएगी तो सोचा है किधर जाऊँगा
बन के ख़ुर्शीद समंदर में उतर जाऊँगा
वक़्त लगना है मगर काम ये कर जाऊँगा
इक न इक दिन मैं तिरे दिल में उतर जाऊँगा
मुझ को मा'लूम है अंजाम-ए-मोहब्बत ऐ दोस्त
मैं तुझे टूट के चाहूँगा बिखर जाऊँगा
याद रक्खेगी मुझे जिस से ये दुनिया 'फ़ैसल'
राह-ए-उल्फ़त में कोई काम वो कर जाऊँगा
तुम से गर दूर रहूँगा तो मैं मर जाऊँगा
शाम आएगी तो सोचा है किधर जाऊँगा
बन के ख़ुर्शीद समंदर में उतर जाऊँगा
वक़्त लगना है मगर काम ये कर जाऊँगा
इक न इक दिन मैं तिरे दिल में उतर जाऊँगा
मुझ को मा'लूम है अंजाम-ए-मोहब्बत ऐ दोस्त
मैं तुझे टूट के चाहूँगा बिखर जाऊँगा
याद रक्खेगी मुझे जिस से ये दुनिया 'फ़ैसल'
राह-ए-उल्फ़त में कोई काम वो कर जाऊँगा
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