रोते देखा उन्हें आख़िरी में
By farooque-adilJanuary 2, 2024
रोते देखा उन्हें आख़िरी में
'उम्र-भर जो रहे गुमरही में
अब दवा दो के ज़हर-ए-हलाहिल
हम तो ख़ुश हैं तुम्हारी ख़ुशी में
ख़ूबियाँ तो बहुत सी हैं लेकिन
बस मुरव्वत नहीं आदमी में
ज़ेहन-ओ-दिल जिस से हो जाए रौशन
ऐसा मज़मून हो शा'इरी में
कुछ न कुछ तो ग़लत-फ़हमियाँ हैं
फ़र्क़ क्यों आ गया दोस्ती में
कोई पूछे ज़रा 'आशिक़ों से
लुत्फ़ मिलता है क्या 'आशिक़ी में
जुज़ मोहब्बत के 'फ़ारूक़-आदिल’
कुछ भी रक्खा नहीं ज़िंदगी में
'उम्र-भर जो रहे गुमरही में
अब दवा दो के ज़हर-ए-हलाहिल
हम तो ख़ुश हैं तुम्हारी ख़ुशी में
ख़ूबियाँ तो बहुत सी हैं लेकिन
बस मुरव्वत नहीं आदमी में
ज़ेहन-ओ-दिल जिस से हो जाए रौशन
ऐसा मज़मून हो शा'इरी में
कुछ न कुछ तो ग़लत-फ़हमियाँ हैं
फ़र्क़ क्यों आ गया दोस्ती में
कोई पूछे ज़रा 'आशिक़ों से
लुत्फ़ मिलता है क्या 'आशिक़ी में
जुज़ मोहब्बत के 'फ़ारूक़-आदिल’
कुछ भी रक्खा नहीं ज़िंदगी में
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