रोज़ कटते हैं यहाँ हाथ कमाने वाले

By umair-ali-anjumJanuary 5, 2024
रोज़ कटते हैं यहाँ हाथ कमाने वाले
जीने देते नहीं मुफ़्लिस को ज़माने वाले
अपना नफ़रत की सियासत से त'अल्लुक़ ही नहीं
हम हैं दम तोड़ती क़द्रों को बचाने वाले


बाँटते हैं जो ज़मीनों को कोई और हैं वो
हम नहीं सहन में दीवार उठाने वाले
आख़िर इक दिन उन्हें तज़लील तो सहना होगी
जो हैं कम-ज़र्फ़ का एहसान उठाने वाले


वा'दा-ए-'इश्क़ निभाने नहीं आते उस को
वही अंदाज़ हैं उस के भी ज़माने वाले
देखना कल इसी धरती से नुमू पाएँगे
मुफ़लिसों के लिए आवाज़ उठाने वाले


यार यारों के लिए जान लुटाते थे 'उमैर'
अब कहाँ लोग त'अल्लुक़ को निभाने वाले
68126 viewsghazalHindi