रूह को क़ैद-ए-त’अल्लुक़ से भी आज़ाद किया
By raft-bahraichiJanuary 4, 2024
रूह को क़ैद-ए-त’अल्लुक़ से भी आज़ाद किया
हम से जिस तरह बना हम ने तुम्हें याद किया
कभी का'बा तो कभी दैर को आबाद किया
हम ने हर रंग में हर तरह उन्हें याद किया
हर नफ़स बार था मेरे लिए हस्ती का वजूद
चलो अच्छा किया तुम ने इसे बर्बाद किया
मैं समझता हूँ वो कोशिश है मिटाने की मिरी
आप ने चुपके से जो चर्ख़ से इरशाद किया
उल्टा है 'इश्क़ का आईन ख़ुदा तेरी पनाह
वो ख़फ़ा बैठे हैं क्यों तू ने मुझे याद किया
तुम न पुर्सिश के लिए आए ज़माना आया
मरते मरते तुम्हें 'राफ़त' ने बहुत याद किया
हम से जिस तरह बना हम ने तुम्हें याद किया
कभी का'बा तो कभी दैर को आबाद किया
हम ने हर रंग में हर तरह उन्हें याद किया
हर नफ़स बार था मेरे लिए हस्ती का वजूद
चलो अच्छा किया तुम ने इसे बर्बाद किया
मैं समझता हूँ वो कोशिश है मिटाने की मिरी
आप ने चुपके से जो चर्ख़ से इरशाद किया
उल्टा है 'इश्क़ का आईन ख़ुदा तेरी पनाह
वो ख़फ़ा बैठे हैं क्यों तू ने मुझे याद किया
तुम न पुर्सिश के लिए आए ज़माना आया
मरते मरते तुम्हें 'राफ़त' ने बहुत याद किया
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