रुख़ पे ज़ुल्फ़ों की जो उन के ये घटा छाई है

By basir-tonkiJanuary 2, 2024
रुख़ पे ज़ुल्फ़ों की जो उन के ये घटा छाई है
रू-ए-ताबाँ पे चमक और उभर आई है
किस ने रा'नाई-ए-जल्वे पे नज़र डाली है
लाइक़-ए-दीद तिरी रौनक़-ओ-ज़ेबाई है


तू वो हस्ती तो नहीं है कि भुला दूँ दिल से
मुझ को हर दम शब-ए-फ़ुर्क़त तिरी याद आई है
रौनक़-ए-बज़्म तिरे दम ही से है ऐ साक़ी
वाह क्या ख़ूब तिरी अंजुमन-आराई है


ये महकती हुई ख़ुशबू ये चमन की रौनक़
आप के दम से चमन में ये बहार आई है
ख़ुद वो आते भी नहीं मुझ को बुलाते भी नहीं
क़ाबिल-ए-दीद मिरा ‘आलम-ए-तन्हाई है


दिल लगाना भी मुसीबत है किसी से 'बासिर'
ये हक़ीक़त मिरे दिल ने मुझे समझाई है
72394 viewsghazalHindi