रुख़्सत हुई जवानी नक़्शा बदल रहा है
By bartar-madrasiJanuary 2, 2024
रुख़्सत हुई जवानी नक़्शा बदल रहा है
था नाज़ तुम को जिस पर वो हुस्न ढल रहा है
हो जाए कुछ से कुछ तो क्या है मक़ाम-ए-हैरत
इक एक पल में रंग-ए-दुनिया बदल रहा है
है दिल-लगी किसी की हाल-ए-ज़बूँ किसी का
हँसती है शम'-ए-महफ़िल परवाना जल रहा है
वो आज-कल तवज्जोह करते हैं मेरी जानिब
दिल इस लिए ख़ुशी से बाँसों उछल रहा है
पूछो उसी के दिल से क्या वक़्त की है क़ीमत
ग़फ़लत में 'उम्र खो कर जो हाथ मल रहा है
देखा है मय-कदे में ये रंग शैख़ जी का
पगड़ी उछल रही है पाँव फिसल रहा है
किस किस तरह से मुझ को वो आज़मा रहे हैं
मैं मर रहा हूँ उन का अरमाँ निकल रहा है
इस की नहीं ख़बर कुछ घटती है 'उम्र अपनी
हम ये समझ रहे हैं बस वक़्त टल रहा है
गर्दन मिरी उड़ा कर क़ातिल है आबदीदा
देखो मिरी करामत लोहा पिघल रहा है
आँखों पे तेरी ज़ालिम क्या पड़ गया है पर्दा
ग़ुंचा समझ के मेरे दिल को मसल रहा है
क्या चीज़ ज़िंदगी है कहते हैं मौत किस को
ये मसअला अभी तक मोहताज-ए-हल रहा है
क़ीमत में क़द्र में हैं अनमोल शे'र मेरे
दरिया-ए-तब' अपना मोती उगल रहा है
जिस दौर में था राइज गुज़रा वो दौर 'बरतर'
इस दौर में वफ़ा का सिक्का न चल रहा है
था नाज़ तुम को जिस पर वो हुस्न ढल रहा है
हो जाए कुछ से कुछ तो क्या है मक़ाम-ए-हैरत
इक एक पल में रंग-ए-दुनिया बदल रहा है
है दिल-लगी किसी की हाल-ए-ज़बूँ किसी का
हँसती है शम'-ए-महफ़िल परवाना जल रहा है
वो आज-कल तवज्जोह करते हैं मेरी जानिब
दिल इस लिए ख़ुशी से बाँसों उछल रहा है
पूछो उसी के दिल से क्या वक़्त की है क़ीमत
ग़फ़लत में 'उम्र खो कर जो हाथ मल रहा है
देखा है मय-कदे में ये रंग शैख़ जी का
पगड़ी उछल रही है पाँव फिसल रहा है
किस किस तरह से मुझ को वो आज़मा रहे हैं
मैं मर रहा हूँ उन का अरमाँ निकल रहा है
इस की नहीं ख़बर कुछ घटती है 'उम्र अपनी
हम ये समझ रहे हैं बस वक़्त टल रहा है
गर्दन मिरी उड़ा कर क़ातिल है आबदीदा
देखो मिरी करामत लोहा पिघल रहा है
आँखों पे तेरी ज़ालिम क्या पड़ गया है पर्दा
ग़ुंचा समझ के मेरे दिल को मसल रहा है
क्या चीज़ ज़िंदगी है कहते हैं मौत किस को
ये मसअला अभी तक मोहताज-ए-हल रहा है
क़ीमत में क़द्र में हैं अनमोल शे'र मेरे
दरिया-ए-तब' अपना मोती उगल रहा है
जिस दौर में था राइज गुज़रा वो दौर 'बरतर'
इस दौर में वफ़ा का सिक्का न चल रहा है
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