सदाएँ दे के मुसलसल बुला रहा है मुझे
By shehzad-anjum-burhaniJanuary 5, 2024
सदाएँ दे के मुसलसल बुला रहा है मुझे
ये कैसा दर्द है अन्दर से खा रहा है मुझे
अभी बुझे नहीं फ़ानूस-ए-चश्म में कुछ ख़्वाब
हवा-ए-फ़र्दा का ख़दशा सता रहा है मुझे
बुझे शरर हैं हवा-ए-विसाल की ज़द पर
तिरी नज़र का इशारा बता रहा है मुझे
मैं ज़ब्त करता रहा खुल के रो नहीं पाया
ये इक हुनर था जो पत्थर बना रहा है मुझे
नवा-ए-गिर्या-ओ-ज़ारी बुलंद करता हूँ
वो शादमानी के क़िस्से सुना रहा है मुझे
मुझे भी 'इल्म है अंजाम-ए-कार क्या होगा
ये कौन ग़ैब से ज़ाहिर में ला रहा है मुझे
ये कैसा दर्द है अन्दर से खा रहा है मुझे
अभी बुझे नहीं फ़ानूस-ए-चश्म में कुछ ख़्वाब
हवा-ए-फ़र्दा का ख़दशा सता रहा है मुझे
बुझे शरर हैं हवा-ए-विसाल की ज़द पर
तिरी नज़र का इशारा बता रहा है मुझे
मैं ज़ब्त करता रहा खुल के रो नहीं पाया
ये इक हुनर था जो पत्थर बना रहा है मुझे
नवा-ए-गिर्या-ओ-ज़ारी बुलंद करता हूँ
वो शादमानी के क़िस्से सुना रहा है मुझे
मुझे भी 'इल्म है अंजाम-ए-कार क्या होगा
ये कौन ग़ैब से ज़ाहिर में ला रहा है मुझे
63916 viewsghazal • Hindi