सफ़र कैसा ये करना पड़ रहा है
By chand-kakralviJanuary 19, 2024
सफ़र कैसा ये करना पड़ रहा है
शरारों से गुज़रना पड़ रहा है
फ़ज़ाएँ तो मो'अत्तर हो रही हैं
गुलाबों को बिखरना पड़ रहा है
किसी को ज़िंदगी देने की ख़ातिर
हमें हर रोज़ मरना पड़ रहा है
बदन में हैं हज़ारों ज़ख़्म फिर भी
समंदर में उतरना पड़ रहा है
जहाँ चलते हुए जलते हैं तलवे
वहाँ हम को ठहरना पड़ रहा है
शिकम से बाँध कर शा'इर के पत्थर
ग़ज़ल का पेट भरना पड़ रहा है
शरारों से गुज़रना पड़ रहा है
फ़ज़ाएँ तो मो'अत्तर हो रही हैं
गुलाबों को बिखरना पड़ रहा है
किसी को ज़िंदगी देने की ख़ातिर
हमें हर रोज़ मरना पड़ रहा है
बदन में हैं हज़ारों ज़ख़्म फिर भी
समंदर में उतरना पड़ रहा है
जहाँ चलते हुए जलते हैं तलवे
वहाँ हम को ठहरना पड़ रहा है
शिकम से बाँध कर शा'इर के पत्थर
ग़ज़ल का पेट भरना पड़ रहा है
19975 viewsghazal • Hindi