सफ़र था थोड़ा मगर कितने मोड़ आए थे

By wasim-nadirJanuary 5, 2024
सफ़र था थोड़ा मगर कितने मोड़ आए थे
कई कहानियाँ हम उन में छोड़ आए थे
मैं उन परिंदों को रोता हूँ जो फ़लक के लिए
ज़मीं से अपना त'अल्लुक़ ही तोड़ आए थे


कोई मलाल हमें अब रुला नहीं सकता
हम एक दर्द पे आँखें निचोड़ आए थे
सवाल सूखे हुए आँसुओं का उलझा रहा
हिसाब वैसे तो हम सारा जोड़ आए थे


ग़ुबार छा गया हर चीज़ पर तो हैरत क्या
दरीचे भी तो खुले हम ही छोड़ आए थे
80068 viewsghazalHindi