सहमे पड़े हैं ज़ेहन में कितने उदास दर्द
By satyawan-satyaJanuary 5, 2024
सहमे पड़े हैं ज़ेहन में कितने उदास दर्द
उस पर भी और बढ़ गए हैं आस-पास दर्द
अपना तो दर्द दर्द है अपने लिए मगर
क्यों दूसरों का भी नहीं लगता है ख़ास दर्द
साक़ी दवा तो रोज़ पिलाता है तू मुझे
पर आज मन है पीने का दसियों गिलास दर्द
मिटती नहीं है इस लिए भी मेरी तिश्नगी
रख देता है लबों पे नई रोज़ प्यास दर्द
उस पर भी और बढ़ गए हैं आस-पास दर्द
अपना तो दर्द दर्द है अपने लिए मगर
क्यों दूसरों का भी नहीं लगता है ख़ास दर्द
साक़ी दवा तो रोज़ पिलाता है तू मुझे
पर आज मन है पीने का दसियों गिलास दर्द
मिटती नहीं है इस लिए भी मेरी तिश्नगी
रख देता है लबों पे नई रोज़ प्यास दर्द
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