साक़िया एक नज़र काफ़ी है बस अब के बरस
By ustad-azmat-hussain-khanJanuary 5, 2024
साक़िया एक नज़र काफ़ी है बस अब के बरस
आँख से आँख को पीता है ये रस अब के बरस
मेरे सय्याद को आया है तरस अब के बरस
रख दिया सह्न-ए-गुलिस्ताँ में क़फ़स अब के बरस
मुंतज़िर आज हर इक रिंद है ऐ अब्र-ए-बहार
मै-कदा ग़र्क़ हो इतना तो बरस अब के बरस
अब्र घिर घिर के चला आता है मयख़ाने की सम्त
काश साक़ी को भी आ जाए तरस अब के बरस
मै-कदा सारा महक जाए मय-ओ-जाम के साथ
बाँधी जाए दर-ए-मय-ख़ाना पे ख़स अब के बरस
जिस का जी चाहे वो साक़ी की नज़र से पी ले
मय-कशो हेच है अंगूर का रस अब के बरस
होने वाला है कोई फ़ाएज़-ए-मंज़िल शायद
आ रही है नई आवाज़-ए-जरस अब के बरस
साहिब-ए-ज़र्फ़ हैं सैराब नज़र से उन की
और भटकते ही रहे अहल-ए-हवस अब के बरस
कोई तिश्ना न रहेगा ज़रा हो जाने दो
सारे मयख़ाने पे 'मैकश' मिरा बस अब के बरस
आँख से आँख को पीता है ये रस अब के बरस
मेरे सय्याद को आया है तरस अब के बरस
रख दिया सह्न-ए-गुलिस्ताँ में क़फ़स अब के बरस
मुंतज़िर आज हर इक रिंद है ऐ अब्र-ए-बहार
मै-कदा ग़र्क़ हो इतना तो बरस अब के बरस
अब्र घिर घिर के चला आता है मयख़ाने की सम्त
काश साक़ी को भी आ जाए तरस अब के बरस
मै-कदा सारा महक जाए मय-ओ-जाम के साथ
बाँधी जाए दर-ए-मय-ख़ाना पे ख़स अब के बरस
जिस का जी चाहे वो साक़ी की नज़र से पी ले
मय-कशो हेच है अंगूर का रस अब के बरस
होने वाला है कोई फ़ाएज़-ए-मंज़िल शायद
आ रही है नई आवाज़-ए-जरस अब के बरस
साहिब-ए-ज़र्फ़ हैं सैराब नज़र से उन की
और भटकते ही रहे अहल-ए-हवस अब के बरस
कोई तिश्ना न रहेगा ज़रा हो जाने दो
सारे मयख़ाने पे 'मैकश' मिरा बस अब के बरस
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