शहर-ओ-बाज़ार से निकल आए

By shahbaz-choudharyJanuary 5, 2024
शहर-ओ-बाज़ार से निकल आए
अब ख़रीदार से निकल आए
आँख तरसी थी एक मुद्दत से
अश्क दीदार से निकल आए


इस कहानी में उस को मरना था
हम ही किरदार से निकल आए
दुश्मनी दुश्मनी नहीं निकली
दोस्त ग़द्दार से निकल आए


पारसा छुप गए सलीबों से
हम गुनहगार से निकल आए
अब कि सुक़रात और फ़लातूँ सब
मेरी गुफ़्तार से निकल आए


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