शहर-ए-दिल काश कि इक शहर-ए-तमन्ना होता
By asif-bilalJanuary 2, 2024
शहर-ए-दिल काश कि इक शहर-ए-तमन्ना होता
यार इस दश्त में कोई तो सहारा होता
मैं तिरे शहर से गुज़रा हूँ तो हंगामा हुआ
गर तिरे पास ठहरता तो भला क्या होता
पा-ब-जौलाँ न सही जाते मगर हम भी ज़रूर
सहन-ए-मक़्तल ने हमें भी तो पुकारा होता
शहर का शहर तुम्हें देखने आया हुआ है
तुम न आते तो मिरी जान तमाशा होता
चश्म-ए-पुर-नम भी अगर हद से तजावुज़ करती
ख़ेमा-ए-ख़्वाब में इक शोर सा बरपा होता
यूँ सर-ए-राह तमाशा न बनाते उस का
नोक-ए-नेज़ा पे अगर कोई तुम्हारा होता
हम मोहब्बत में कोई चाल जो चलते 'आसिफ़'
वो जो कहने को हमारा है हमारा होता
यार इस दश्त में कोई तो सहारा होता
मैं तिरे शहर से गुज़रा हूँ तो हंगामा हुआ
गर तिरे पास ठहरता तो भला क्या होता
पा-ब-जौलाँ न सही जाते मगर हम भी ज़रूर
सहन-ए-मक़्तल ने हमें भी तो पुकारा होता
शहर का शहर तुम्हें देखने आया हुआ है
तुम न आते तो मिरी जान तमाशा होता
चश्म-ए-पुर-नम भी अगर हद से तजावुज़ करती
ख़ेमा-ए-ख़्वाब में इक शोर सा बरपा होता
यूँ सर-ए-राह तमाशा न बनाते उस का
नोक-ए-नेज़ा पे अगर कोई तुम्हारा होता
हम मोहब्बत में कोई चाल जो चलते 'आसिफ़'
वो जो कहने को हमारा है हमारा होता
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